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उद्योग पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
द्यामन्तरं समास्थाय़ यथाय़ुक्तं मनस्विनः |  २   क
चक्रं तद्वासुदेवस्य माय़या वर्तते विभो ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति