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वन पर्व
अध्याय १३४
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अष्टावक्र उवाच
अनेन वै व्राह्मणाः शुश्रुवांसो; वादे जित्वा सलिले मज्जिताः किल |  २३   क
तानेव धर्मानय़मद्य वन्दी; प्राप्नोतु गृह्याप्सु निमज्जय़ैनम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति