अनुशासन पर्व  अध्याय ९६

इन्द्र उवाच

इत्युक्तः स महेन्द्रेण तपस्वी कोपनो भृशम् |  ५०   क
जग्राह पुष्करं धीमान्प्रसन्नश्चाभवन्मुनिः ||  ५०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति