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भीष्म पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
संसक्तमतितेजोभिस्तमेकं ददृशुर्जनाः |  २   क
पञ्चभिर्मनुजव्याघ्रैर्गजैः सिंहशिशुं यथा ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति