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भीष्म पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
अथैनं पञ्चविंशत्या क्षिप्रमेव समर्पय़त् |  २३   क
अश्वांश्चास्यावधीद्राजन्नुभौ तौ पार्ष्णिसारथी ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति