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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
पार्थ पाशुपतं नाम परमास्त्रं सनातनम् |  १६   क
येन सर्वान्मृधे दैत्याञ्जघ्ने देवो महेश्वरः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति