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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
तं देवं मनसा ध्याय़ञ्जोषमास्स्व धनञ्जय़ |  १८   क
ततस्तस्य प्रसादात्त्वं भक्तः प्राप्स्यसि तन्महत् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति