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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
उदीच्यां दिशि धर्मात्मा सोऽपश्यच्छ्वेतपर्वतम् |  २३   क
कुवेरस्य विहारे च नलिनीं पद्मभूषिताम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति