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उद्योग पर्व
अध्याय ५१
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धृतराष्ट्र उवाच
घृणी कर्णः प्रमादी च आचार्यः स्थविरो गुरुः |  ५   क
समर्थो वलवान्पार्थो दृढधन्वा जितक्लमः |  ५   ख
भवेत्सुतुमुलं युद्धं सर्वशोऽप्यपराजय़ः ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति