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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
प्रत्युत्थानं तु कृष्णस्य सर्वावस्थं धनञ्जय़ः |  ३   क
नालोपय़त धर्मात्मा भक्त्या प्रेम्णा च सर्वदा ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति