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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
ग्रहनक्षत्रसोमानां सूर्याग्न्योश्च समत्विषम् |  ३३   क
अपश्यत तदा पार्थो ज्वलन्तमिव पर्वतम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति