द्रोण पर्व  अध्याय ५७

सञ्जय़ उवाच

वासुदेवस्तु तं दृष्ट्वा जगाम शिरसा क्षितिम् |  ३९   क
पार्थेन सह धर्मात्मा गृणन्व्रह्म सनातनम् ||  ३९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति