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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
लोकादिं विश्वकर्माणमजमीशानमव्ययम् |  ४०   क
मनसः परमां योनिं खं वाय़ुं ज्योतिषां निधिम् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति