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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
यं प्रपश्यन्ति विद्वांसः सूक्ष्माध्यात्मपदैषिणः |  ४४   क
तमजं कारणात्मानं जग्मतुः शरणं भवम् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति