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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
अर्जुनश्चापि तं देवं भूय़ो भूय़ोऽभ्यवन्दत |  ४५   क
ज्ञात्वैकं भूतभव्यादिं सर्वभूतभवोद्भवम् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति