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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
अचिन्त्याय़ाम्विकाभर्त्रे सर्वदेवस्तुताय़ च |  ५३   क
वृषध्वजाय़ पिङ्गाय़ जटिने व्रह्मचारिणे ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति