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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
ततः पार्थस्य विज्ञाय़ वरार्थे वचनं प्रभुः |  ६३   क
वासुदेवार्जुनौ देवः स्मय़मानोऽभ्यभाषत ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति