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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
किमर्थं च विषादस्ते तद्व्रूहि वदतां वर |  ७   क
न शोचितव्यं विदुषा शोकः कार्यविनाशनः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति