वन पर्व  अध्याय २३

वासुदेव उवाच

एवं निहत्य समरे शाल्वं सौभं निपात्य च |  ४०   क
आनर्तान्पुनरागम्य सुहृदां प्रीतिमावहम् ||  ४०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति