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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
ततः पार्श्वाद्वृषाङ्कस्य व्रह्मचारी न्यवर्तत |  ७४   क
पिङ्गाक्षस्तपसः क्षेत्रं वलवान्नीललोहितः ||  ७४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति