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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
स तद्गृह्य धनुःश्रेष्ठं तस्थौ स्थानं समाहितः |  ७५   क
व्यकर्षच्चापि विधिवत्सशरं धनुरुत्तमम् ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति