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वन पर्व
अध्याय २३
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वासुदेव उवाच
न शत्रुरवमन्तव्यो दुर्वलोऽपि वलीय़सा |  २३   क
योऽपि स्यात्पीठगः कश्चित्किं पुनः समरे स्थितः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति