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द्रोण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
अनुज्ञातौ क्षणे तस्मिन्भवेनार्जुनकेशवौ |  ८१   क
प्राप्तौ स्वशिविरं वीरौ मुदा परमय़ा युतौ |  ८१   ख
इन्द्राविष्णू यथा प्रीतौ जम्भस्य वधकाङ्क्षिणौ ||  ८१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति