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कर्ण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
प्रय़ातश्च महावाहुः पाण्डवानुज्ञय़ा हरिः |  १०   क
आश्वासय़न्रथेनैव पाण्डुसैन्यानि सर्वशः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति