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कर्ण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
विरथं धर्मराजं च दृष्ट्वा सुदृढविक्षतम् |  १९   क
शिखण्डिनं सात्यकिं च धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति