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कर्ण पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
न तं पश्यामि लोकेऽस्मिंस्त्वत्तोऽप्यन्यं धनुर्धरम् |  २३   क
अर्जुनं समरे क्रुद्धं यो वेलामिव धारय़ेत् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति