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अनुशासन पर्व
अध्याय १००
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पृथिव्यु उवाच
सदा यज्ञेन देवांश्च आतिथ्येन च मानवान् |  ६   क
छन्दतश्च यथानित्यमर्हान्युञ्जीत नित्यशः |  ६   ख
तेन ह्यृषिगणाः प्रीता भवन्ति मधुसूदन ||  ६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति