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कर्ण पर्व
अध्याय ५७
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कर्ण उवाच
नैतादृशो जातु वभूव लोके; रथोत्तमो यावदनुश्रुतं नः |  ३७   क
तमीदृशं प्रतिय़ोत्स्यामि पार्थं; महाहवे पश्य च पौरुषं मे ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति