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कर्ण पर्व
अध्याय ५७
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कर्ण उवाच
निरुन्धताभिद्रवताच्युतार्जुनौ; श्रमेण संय़ोजय़ताशु सर्वतः |  ५२   क
यथा भवद्भिर्भृशविक्षतावुभौ; सुखेन हन्यामहमद्य भूमिपाः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति