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कर्ण पर्व
अध्याय ५७
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कर्ण उवाच
अथाग्र्यवाणैर्दशभिर्धनञ्जय़ं; पराभिनद्द्रोणसुतोऽच्युतं त्रिभिः |  ५८   क
चतुर्भिरश्वांश्चतुरः कपिं तथा; शरैः स नाराचवरैरवाकिरत् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति