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शल्य पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
समुदीर्णं ततो दृष्ट्वा सङ्ग्रामं कुरुमुख्ययोः |  १   क
अथाव्रवीदर्जुनस्तु वासुदेवं यशस्विनम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति