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शल्य पर्व
अध्याय ५७
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सञ्जय़ उवाच
अनय़ोर्वीरय़ोर्युद्धे को ज्याय़ान्भवतो मतः |  २   क
कस्य वा को गुणो भूय़ानेतद्वद जनार्दन ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति