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शल्य पर्व
अध्याय ५७
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वासुदेव उवाच
अन्योन्यं तौ जिघांसन्तौ प्रवीरौ पुरुषर्षभौ |  २३   क
युय़ुधाते गरुत्मन्तौ यथा नागामिषैषिणौ ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति