शल्य पर्व  अध्याय ५७

वासुदेव उवाच

समं प्रहरतोस्तत्र शूरय़ोर्वलिनोर्मृधे |  २५   क
क्षुव्धय़ोर्वाय़ुना राजन्द्वय़ोरिव समुद्रय़ोः ||  २५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति