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शल्य पर्व
अध्याय ५७
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वासुदेव उवाच
तस्मिंस्तदा सम्प्रहारे दारुणे सङ्कुले भृशम् |  २७   क
उभावपि परिश्रान्तौ युध्यमानावरिन्दमौ ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति