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शल्य पर्व
अध्याय ५७
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वासुदेव उवाच
जर्जरीकृतसर्वाङ्गौ रुधिरेणाभिसम्प्लुतौ |  ३१   क
ददृशाते हिमवति पुष्पिताविव किंशुकौ ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति