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शल्य पर्व
अध्याय ५७
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वासुदेव उवाच
तमभ्याशगतं प्राज्ञो रणे प्रेक्ष्य वृकोदरः |  ३३   क
अवाक्षिपद्गदां तस्मै वेगेन महता वली ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति