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शल्य पर्व
अध्याय ५७
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वासुदेव उवाच
अवक्षेपं तु तं दृष्ट्वा पुत्रस्तव विशां पते |  ३४   क
अपासर्पत्ततः स्थानात्सा मोघा न्यपतद्भुवि ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति