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शल्य पर्व
अध्याय ५७
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वासुदेव उवाच
अमन्यत स्थितं ह्येनं प्रहरिष्यन्तमाहवे |  ३८   क
अतो न प्राहरत्तस्मै पुनरेव तवात्मजः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति