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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततः स्वस्तिपुरं गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप |  १५२   क
पावनं तीर्थमासाद्य तर्पय़ेत्पितृदेवताः |  १५२   ख
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ||  १५२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति