विराट पर्व  अध्याय ६६

विराट उवाच

यदस्माभिरजानद्भिः किञ्चिदुक्तो नराधिपः |  २०   क
क्षन्तुमर्हति तत्सर्वं धर्मात्मा ह्येष पाण्डवः ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति