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शल्य पर्व
अध्याय ५७
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वासुदेव उवाच
यक्षाणां राक्षसानां च पिशाचानां तथैव च |  ४९   क
अन्तरिक्षे महानादः श्रूय़ते भरतर्षभ ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति