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शल्य पर्व
अध्याय ५७
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वासुदेव उवाच
माय़या निर्जिता देवैरसुरा इति नः श्रुतम् |  ५   क
विरोचनश्च शक्रेण माय़या निर्जितः सखे |  ५   ख
माय़या चाक्षिपत्तेजो वृत्रस्य वलसूदनः ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति