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शल्य पर्व
अध्याय ५७
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वासुदेव उवाच
भेरीशङ्खमृदङ्गानामभवच्च स्वनो महान् |  ५२   क
अन्तर्भूमिगतश्चैव तव पुत्रे निपातिते ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति