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शल्य पर्व
अध्याय ५७
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वासुदेव उवाच
ह्रदाः कूपाश्च रुधिरमुद्वेमुर्नृपसत्तम |  ५५   क
नद्यश्च सुमहावेगाः प्रतिस्रोतोवहाभवन् ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति