शल्य पर्व  अध्याय ५७

वासुदेव उवाच

पुनरेव च वक्ष्यामि पाण्डवेदं निवोध मे |  ९   क
धर्मराजापराधेन भय़ं नः पुनरागतम् ||  ९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति