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आदि पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽवर्धन्त धर्मेण सहस्रशतजीविनः |  १०   क
ताः प्रजाः पृथिवीपाल धर्मव्रतपराय़णाः |  १०   ख
आधिभिर्व्याधिभिश्चैव विमुक्ताः सर्वशो नराः ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति