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आदि पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
कारय़न्तः कृषिं गोभिस्तथा वैश्याः क्षिताविह |  १९   क
न गामय़ुञ्जन्त धुरि कृशाङ्गाश्चाप्यजीवय़न् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति