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वन पर्व
अध्याय २९६
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वैशम्पाय़न उवाच
भ्रातृशोकाभिसन्तप्तस्तृषय़ा च प्रपीडितः |  १७   क
अभिदुद्राव पानीय़ं ततो वागभ्यभाषत ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति