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आदि पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः समुदिते लोके मानुषे भरतर्षभ |  २५   क
असुरा जज्ञिरे क्षेत्रे राज्ञां मनुजपुङ्गव ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति